मुख्य पदाधिकारी

  • डॉ प्रेमचंद शास्त्री

    उपाध्यक्ष
    उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी

  • श्री. जी. एस. भाकुनी

    सचिव
    उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी

  • श्री. नवीन नैथानी

    कोषाध्यक्ष
    उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी




परिचय उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी

सम्पूर्ण विश्व में देवभूमि के नाम से विख्यात उत्तराखण्ड का सम्बन्ध देववाणी संस्कृत से प्राचीन काल से ही रहा है। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, धर्मस्मृतियां आदि हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत भाषा में लिखे हुए हैं। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार 18 पुराणों की रचना महर्षि वेदव्यास ने उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध बदरीनाथ धाम के समीप माणागाँव में की थी। वहाँ पर कविकुलगुरु महाकवि कालिदास का प्रारम्भिक जीवन उत्तराखण्ड की पहाडि़यों (कविल्ठा ग्राम रुद्रप्रयाग) पर बीता है इस विषय में सभी संस्कृत विद्वान् एकमत हो रहे हैं। देवतात्मा हिमालय का सौन्दर्य एवं सुषमा उनके काव्यों एवं नाटकों में स्पष्ट परिलक्षित होता है। उत्तराखण्ड में बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री पवित्र चार धामों सहित अनेक मठ एवं मन्दिरों में नित्य पूजा, पाठ, भजन, कीर्तन एवं प्रवचनादि संस्कृत भाषा में ही सम्पादित होते हैं। उत्तराखण्ड में 90 संस्कृत विद्यालय एवं महाविद्यालय है जहाँ अध्ययन एवं अध्यापन का कार्य संस्कृतभाषा में ही सम्पन्न होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि देवभूमि उत्तराखण्ड से ही संस्कृत ज्ञानगंगा धारा भारत भूमि को पवित्र करती हुई सम्पूर्ण विश्व में प्रवाहित हुई थी।

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उत्तराखण्ड संस्कृत अकादमी के उद्देश्य

विश्वभर में उपलब्ध संस्कृत अभिलेखों को एकत्रित कर पुस्तकालय/अभिलेखागार बनाया जायेगा, जिससे संस्कृत साहित्य के परिवर्धन एवं शोध को प्रोत्साहन प्राप्त होगा।

- संस्कृत के ग्रन्थों एवं अभिलेखों का प्रकाशन।
- संस्कृत साहित्य के विशिष्ट पुस्तकालय की स्थापना।
- संस्कृत का सरलीकरण।
- संस्कृत के वैज्ञानिक तथा अन्य विषयों से प्रासंगिकता एवं दूसरी भाषाओं में अनुवाद/उनका आधुनिक विकसित माध्यमों से प्रकाशन।

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